दहेज उत्पीड़न पर SC के फैसले का अध्ययन कर रिपोर्ट सौंपेगी केंद्र सरकार

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देश में देहज उत्पीड़ने के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए बीते दिनों कहा था कि उत्पीड़ने के मामलों में तुरंत गिरफ्तारी जरूरी नहीं है. अब कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि कोर्ट के उस फैसले का दहेज प्रताड़ना के मामलों पर क्या प्रभाव पड़ा है. इस बाबत केंद्र सरकार डेढ़ महीने में एक विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट को सौंपेगी.सुप्रीम कोर्ट ने इस साल जुलाई में दिए अपने फैसले में कहा था कि दहेज उत्पीड़न को लेकर परिवार के सभी सदस्यों की तत्काल गिरफ्तारी ना हो. इसके बाद एक NGO मानव अधिकार मंच ने उस फैसले की समीक्षा की याचिका इस दलील के साथ लगाई कि इससे दहेज उन्मूलन कानून कमज़ोर होगा. इस याचिका की सुनवाई के दौरान जारी नोटिस के जवाब में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वो कोर्ट के फैसले का अध्ययन कर रही है.

केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि वह विचार कर रही है कि इस फैसले को सम्यक ढंग से लागू कैसे किया जाए ताकि कानून पर अमल भी कारगर हो और निर्दोष लोगों को सताया भी न जा सके.

मानव अधिकार मंच ने मांग की है कि इसस संबंध में दूसरी गाइड लाइन बनाने की जरूरत है. क्योंकि कोर्ट के फैसले के बाद दहेज उत्पीड़न का कानून कमजोर हुआ है. याचिका में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट का हवाला भी दिया गया है.  रिपोर्ट में कहा गया है कि 2012 से 2015 के बीच 32,000 महिलाओं की मौत की वजह दहेज उत्पीड़न ही था. 

इस साल जुलाई में आये फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आईपीसी की धारा-498 ए यानी दहेज प्रताड़ना मामले में सीधे  गिरफ्तारी नहीं होगी. दहेज प्रताड़ना के मामलों को देखने के लिए हर जिले में एक परिवार कल्याण समिति बनाई जाए. गिरफ्तारी का आधार समिति की रिपोर्ट हो, यानी रिपोर्ट आने के बाद ही गिरफ्तारी होनी चाहिए उससे पहले नहीं.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में भी और सुनवाई के दौरान भी दहेज प्रताड़ना मामले में कानून के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए लीगल सर्विस अथॉरिटी से कहा है कि सभी जिले में परिवार कल्याण समिति बनाई जाए. इन समितियों में समाज के प्रभावशाली गणमान्य लोग भी शामिल किए जाएं ताकि पूरे मामले को निष्पक्ष रूप से समझा जाए. तब समिति की रिपोर्ट विश्वसनीय होगी और उस पर समुचित कानूनी कार्रवाई भी न्याय दिलाने में कारगर होगी.