कुर्बानी बोझ बन गई है, अब इस रिवायत का रिव्यू करना जरूरी

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नई दिल्ली। ईद-उल-अजहा यानि बकरीद का मौका है और बाजार में चहल-पहल बढ़ गई है। हर साल की तरह इस साल भी बकरे और दूसरे जानवर बाजार में दिख रहे हैं। मुस्लिम मुहल्लों में कुर्बानी के लिए इश्तिहार भी खूब दिख रहे हैं। बकरीद पर लोगों में ईद-उल-फित्र की ना बच्चों के कपड़ों की फिक्र दिखती है और कोई दूसरे इंतिजामात की, बस सबको कुर्बानी का इंतजाम कर लेना है लेकिन सवाल ये है कि क्या वाकई कुर्बानी हमारे समाज के और कमजोर तबके के किसी काम आ रही है या फिर ये रिवायत अब एक बड़े तबके पर बोझ बन चुकी है और ईमानदारी से रिव्यू की मांग कर रही है।   

धार्मिक उन्माद के इस दौर में किसी धार्मिक संस्था या किसी रिवाज पर कुछ भी कहना आसान तो नहीं है लेकिन यकीन करिए कि अगर अब भी इन पर बात ना की गई तो बहुत देर हो जाएगी और जब मजहब से जुड़ी बात है तो इसमें मजहबी रहनुमाओं से मुखातिब होकर बात कहना इसलिए जरूरी है क्योंकि सच ये है कि मजहबी मामलों में फैसले लोग खुद नहीं लेते बल्कि मदरसों और मुफ्ती के पास ही पहुंचते हैं। ऐसे में कुर्बानी को लेकर रहनुमाओं को सोचने की जरूरत है। 

बदतर है मुसलमानों की माली हालत दुनिया की बात छोड़ दी जाए तो भारत में करीब 18 करोड़ मुसलमान रहते हैं। तमाम रिपोर्ट्स ये बताती है कि मुसलमानों की हालत भारत में बद से भी बदतर है। शिक्षा, स्वास्थ्य से लेकर नौकरी, रोजगार तक हर जगह मुसलमानों की हालत खराब है। ऐसे में एक ऐसा रिवाज, जो एक आर्थिक वजन इस कमजोर तबके पर डाल दे, वो कहां तक सही है। जिन लोगों के पास दवाई नहीं है, बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे, उन्हें हर साल 5, 6, या 10 हजार रुपए गोश्त खाने (कुर्बानी) के लिए देने पड़ रहे हैं। मुसलमानों के पांच से दस फीसदी तबके के लिए ये 10 या 20 हजार रुपए बकरे के लिए देना कोई मुश्किल काम ना हो लेकिन बाकी के लिए कितना मुश्किल है ये किसी रिपोर्ट को ना देखकर किसी मु्स्लिम मुहल्ले में ही घूम आएं तो समझ में आ जाएगा। ऐसे में सोचिए कि उस तबके पर जो दो जून की रोटी के लिए परेशान है, वो कहां से कुर्बानी के लिए पैसा लाए। हालांकि पैसा और माली हालत की बात करना रहनुमाओं से कोई अपील करना बेमानी ही है क्योंकि ‘चंदा खाने वाली कौम’ शायद ही कमाने वाले के दर्द को समझे। 

कुर्बानी के बचाव में सबसे बड़ा तर्क यही है कि हजारों साल पहले हुए इस प्रथा की कोशिश गरीब का पेट भरना है। अमीर लोग अपने जानवर की कुर्बानी करें और गरीबों में गोश्त बांटें। ऐसे में उन लोगों का भी पेट भर जाएगा, जिनको अकसर भूखे ही सोना पड़ता है। दूर से देखने में ये बड़ा खूबसूरत लगता है और शायद हजारों सालों तक ये अपने इस मकसद में कामयाब रहा भी हो लेकिन जरूरत आज के वक्त में इसको देखने की है। क्या आज के समाज में भी बलि, कुर्बानी जैसी चीजें रहनी चाहिएं। हम आस्था के सवाल के दूर जाकर इसे देखें तो शायद बेहतर हो। इसके लिए ये बातें भी जरूर देखी जानी चाहिएं। 

अपनी महबूब चीज की कुर्बानी कुर्बानी अल्लाह की राह में अपनी महबूब चीज को कुर्बान करने का नाम है और एक बात बहुत साफ है कि 90 फीसदी लोग उस जानवर को ईद के दिन ही देखते हैं, जिसकी कुर्बानी दी जानी है। ऐसे में कहां से वो महबूब हो गया। शहरी कल्चर में तो सीधे-सीधे 5000 रुपए दो और ईद के दिन गोश्त ले आओ। ऐसे में क्या सीधे रुपए ही गरीब को क्यों नहीं दिए जा सकते? 

समाज का दवाब कुर्बानी के क्या कायदे-कानून हैं, लेकिन सच ये है कि उनसे परे आज ये प्रतिष्ठा का सवाल बन गई है। ये एक तरह से ऐसा हो गया है कि समाज में रहना है तो कुर्बानी तो करनी ही पड़ेगी ही, भले ही कर्ज लेकर करनी हो। अगर कोई अमीर आदमी कुर्बानी नहीं करेगा तो पड़ोस के लोग उसे हिकारत से देखेंगे। आर्थिक तौर पर थोड़ा कमजोर आदमी कुर्बानी नहीं करेगा तो उसके यहां पड़ोस के लोग गोश्त भेजना शुरू कर देंगे और उसे ऐसा महसूस करा देंगे जैसे वो कई पीढ़ियों से जकात पर ही पल रहा हो। इससे बचने के लिए कई लोग किसी भी तरह इंतजाम कर कुर्बानी करते हैं। ऐसे में कुर्बानी एक बड़े तबके के लिए बोझ बन गई है। 

खुशी-खुशी करते हैं लोग कुर्बानी? कुर्बानी के बारे में तर्क दिया जाता है कि लोग खुशी से करते हैं कई जबरदस्ती तो नहीं करता। तो आपको बता दूं कि ऐसे कई काम हैं जो खुशी से ही होते हैं क्योंकि इससे नाखुशी जाहिर करने की आपको इजाजत ही नहीं होती। लोग जमीन और दुकान बेचकर दहेज देते हैं, इसमें भी जबरदस्ती नहीं होती बल्कि पिता खुशी से देता है। औरतें बुर्का पहनती हैं, खुशी से, यहां तक कि हलाला और बहु विवाह से भी वो खुश हैं। मंगलसूत्र, करवाचौथ, शादी और ना जाने कितनी बातें हैं, जिन्हें कहा जाता है कि ये तो अपनी मर्जी और खुशी है लेकिन हकीकत यही है कि उनके पीछे एक बड़ा दबाव है और इनसे इंकार एक बगावत। कुर्बानी भी कुछ ऐसी ही है। 

गोश्त की बर्बादी और गंदगी जैसा कि मैंने कहा कि ज्यादातर लोग कुर्बानी करते हैं। अमूमन शहरों में कुर्बानी के लिए कोई खास जगह नहीं है और ना ही पशुओं के अवशेषों के डिस्पोजल की व्यवस्था। ऐसे में कुर्बानी के बाद खुले में कहीं पशुओं के अवशेष डाल दिए जाते हैं, बीमारियों को ही न्यौता देते हैं। दूसरी तरफ गोश्त भी इतना ज्यादा होता है कि उसकी बर्बादी होती है। एक आदमी जो आमतौर पर 500 ग्राम गोश्त खाता है, वो ईद पर 5 किलो तो खा नहीं सकता, ऐसे में गोश्त की बर्बादी भी देखने को मिलती है। ये सीधे तौर पर एक कौम की माली हालत पर सीधा वार ही है।

सबसे आसान बात ये कहना है कि कुर्बानी धर्म की चीज है और उसे इस तरह से माली हालत या सामाजिक स्थिति से नहीं जोड़ना चाहिए। इस पर कोई बहस नहीं होनी चाहिए, वैसे भी हमारे मंत्री तक ये बता चुके हैं कि ‘श्रद्धा पर 144 नहीं लगती’। इस सबके बावजूद रहनुमा इस पर सोचें तो बेहतर हो और अगर नहीं सोचते तो फिर हम खुद सोचें और जालिब की जुबान में ये कहा जा सकता है – 

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